बी एड - एम एड >> बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षणसरल प्रश्नोत्तर समूह
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बीएड सेमेस्टर-2 हिन्दी शिक्षण - सरल प्रश्नोत्तर
अध्याय 1 - हिन्दी भाषा का उद्भव एवं विकास एवं भाषा के विविध रूप
प्रश्न- हिन्दी भाषा के उद्भव और स्वरूप को विवेचित कीजिए।
उत्तर-
'हिन्दी' जिस भाषा-धारा के विशिष्ट दैशिक और कालिक रूप का नाम है, भारत में उसका प्राचीनतम रूप संस्कृत है। संस्कृत का काल मोटे रूप में 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक माना जाता है। इस काल में संस्कृत बोलचाल की भाषा का ही शिष्ट और मानक रूप संस्कृत वाङ्गमय में प्रयुक्त हुआ है। संस्कृत भाषा के दो रूप मिलते हैं- एक भाषा वैदिक संस्कृत है जिसमें वैदिक वाङ्मय की रचना हुई है। दूसरी लौकिक या क्लासिकल संस्कृत है जिसमें वाल्मीकि, व्यास, भास, अश्वघोष, कालिदास, माघ आदि की रचनाएँ हैं। इस संस्कृत काल के अन्त तक मानक या परिनिष्ठित भाषा तो एक थी, किन्तु क्षेत्रीय तीन बोलियाँ विकसित हो चली थीं, जिन्हें पश्चिमोत्तरी, मध्यदेशी तथा पूर्वी नाम से अभिहित किया जा सकता है।
संस्कृतकालीन बोलचाल की भाषा विकसित होते-होते 500 ई.पू. के बाद प्रवृत्तितः काफी बदल गयी, जिसे 'पालि' की संज्ञा दी गयी। इसका काल 500 ई.पू. से पहली ईसवी तक है। पहली ईसवी तक आते-आते यह बोलचाल की भाषा और परिवर्तित हुई तथा पहली ई. से 500 ई. तक का इसका रूप 'प्राकृत' नाम से अभिहित किया गया। इस काल में क्षेत्रीय बोलियां कई थीं, जिनमें मुख्य शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, महाराष्ट्री, मागधी और अर्धमागधी थीं।
प्राकृतों से ही विभिन्न क्षेत्रीय अपभ्रंशों का विकास हुआ। अपभ्रंश भाषा का काल मोटे रूप से 500 ई. से 1000 ई. तक है। आज के प्राप्त अपभ्रंश साहित्य में मुख्यतः पश्चिमी और पूर्वी दो ही भाषा-रूप मिलते हैं, किन्तु प्राकृत के मुख्यतः पाँच क्षेत्रीय रूपों तथा आज की दस (लहंदा, पंजाबी, सिन्धी, गुजराती, मराठी, हिन्दी, उड़िया, बांग्ला, असमिया) आर्यभाषाओं के बीच की कड़ी के क्षेत्रीय रूपों की संख्या छः और दस के बीच में ही होगी। इससे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि अपभ्रंश के सभी क्षेत्रीय रूपों का अपभ्रंश साहित्य में प्रयोग नहीं हुआ। यदि विभिन्न प्राकृतों से विकसित अपभ्रंशों को किसी अन्य नाम के अभाव में प्राकृत नामों से ही अभिहित करें तो आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों में इस प्रकार माना जा सकता है-
अपभ्रंश | आधुनिक भाषायें तथा उपभाषाएँ |
शौरसेनी | पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती। |
पैशाची | लहँदा, पंजाबी। |
ब्राचड | सिन्धी |
महाराष्ट्री | मराठी |
मागधी | बिहार, बांग्ला, उड़िया, असमिया। |
अर्ध-मागधी | पूर्वी हिन्दी। |
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि हिन्दी भाषा का उद्भव अपभ्रंश के शौरसेनी, अर्धमागधी और मागधी रूपों से हुआ है। अपभ्रंश और आधुनिक हिन्दी के बीच की कड़ी के रूप में भाषा का एक रूप उपलब्ध होता है। इसे विद्वानों का वर्ग अवहट्ट कहता है तथा विद्वानों का एक अन्य वर्ग अपभ्रंश ही कहना पसन्द करता है।
हिन्दी - उपभाषाएँ तथा बोलियाँ
भाषा | उपभाषायें | बोलियाँ |
1. हिन्दी | 1. पश्चिमी हिन्दी | 1. खड़ी बोली (कौरवी) 2. ब्रजभाषा, 3. हरियाणी, 4. बुन्देली, 5. कन्नौजी। |
2. पूर्वी हिन्दी | 1. अवधी, 2. बघेली, 3. छत्तीसगढ़ी। | |
3. राजस्थानी | 1. पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी). | |
2. पूर्वी राजस्थानी (मेवाती) | ||
3. दक्षिणी राजस्थानी (मालवी) | ||
4. पहाडी | 1. पश्चिमी पहाड़ी, 2. मध्यवर्ती पहाडी (कुमाउनी-गढ़वाली) | |
5. बिहारी | 1. भोजपुरी, 2. मगही, 3. मैथिली। |
खड़ी बोली -'खड़ी बोली' शब्द का दो अर्थों में प्रयोग होता है, एक तो साहित्यिक हिन्दी खड़ी बोली के अर्थ में और दूसरे दिल्ली, मेरठ के आस-पास की लोक-बोली के अर्थ में। यहाँ दूसरे में ही इस शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। इसी अर्थ में 'कोरवी' का भी प्रयोग कुछ लोग करते हैं। 'खड़ी बोली' में खड़ी शब्द का अर्थ विवादास्पद है। कुछ लोगों ने 'खड़ी' का अर्थ 'खरी' (Pure) अर्थात् शुद्ध माना है, तो दूसरों ने 'खड़ी' (Standing)। खड़ी बोली या कौरवी का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है। इसका क्षेत्र देहरादून का मैदानी भाग, सहारनपुर, मुजफ्फर नगर, मेरठ, दिल्ली का कुछ भाग, बिजनौर रामपुर तथा मुरादाबाद है।
ब्रजभाषा - ब्रज का पुराना अर्थ 'पशुओं या गौआ' का समूह या चारागाह आदि है। पशुपालन के प्राधान्य के कारण यह क्षेत्र ब्रज कहलाया, और इसी आधार पर इसकी बोली ब्रजभाषा कहलायी। इसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से हुआ है। ब्रजभाषा, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, धौरपुर, मैनपुरी, एटा, बदायूँ, बरेली तथा आस-पास के क्षेत्रों में बोली जाती है। साहित्य और लोक- साहित्य दोनों ही दृष्टियों से ब्रजभाषा बहुत सम्पन्न है। सूरदास, तुलसीदास, नन्ददास, रहीम, रसखान, बिहारी, देव, रत्नाकर आदि इसके प्रमुख कवि हैं।
हरियाणी - 'हरियाना' शब्द की व्युत्पत्ति विवादास्पद है। हरि + यान (कृष्ण का यान इधर से, ही द्वारिका गया था।). हरि + अरण्य (हरावन) तथा अहीर + आना (राजूताना, तिलगांना की तरह) आदि किन्तु कोई मत सर्वमान्य नहीं है। हरियाणी का विकास उत्तर- शौरसनी अपभ्रंश के पश्चिम रूप से हुआ है। खड़ी बोली, अहीरवाटी, ए मारवाड़ी, पंजाबी से घिरी इस बोली को कुछ लोग खड़ी बोली का पंजाबी से प्रभावित रूप मानते हैं। इसका क्षेत्र मोटे रूप से हरियाणा तथा दिल्ली का देहाती भाग है।
बुन्देली - बुन्देले राजपूतों के कारण मध्य प्रदेश तथा उत्तर- प्रदेश की सीमा रेखा के झाँसी, छतरपुर, सागर आदि तथा आस-पास के भाग को बुन्देलखण्ड कहते हैं, वहीं की बोली बुन्देली या बुन्देलखण्डी है। इसका क्षेत्र झांसी, जालौन, हमीरपुर, ग्वालियर, ओरछा, सागर, नृसिंहपुर, सिवनी, होशंगाबाद तथा आस-पास का क्षेत्र है। बुंन्देली का विकास शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है।
कन्नौजी - कन्नौज इस बोली का केन्द्र है, अतः इसका नाम कन्नौजी पड़ा है। यह इटावा, फर्रुखाबाद, शाहजहाँपुर, कानपुर, हरदोई, पीलीभीत आदि में बोली जाती है। कन्नौजी भी शौरसेनी अपभ्रंश से ही निकाली है। यह ब्रजभाषा से इतनी अधिक समान है कि कुछ लोग इसे ब्रजभाषा की ही एक उपबोली मानते हैं।
अवधी - इस बोली का केन्द्र अयोध्या है। 'अयोध्या' का ही विकसित रूप 'अवध' है जिससे 'अवधी' शब्द बना है। इसके उद्भव के सम्बन्ध में विवाद है। अधिकांश विद्वान इसका सम्बन्ध अर्धमागधी अपभ्रंश से मानते हैं, किन्तु कुछ लोग इससे पालि की समानता के आधार पर इस मत को नहीं मानते। इसका क्षेत्र लखनऊ, इलाहाबाद, उन्नाव, मिर्जापुर, फतेहपुर, रायबरेली, सीतापुर, फैजाबाद, गोण्डा, बस्ती, बहराइच, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, बारबंकी आदि है। इस भाषा के प्रसिद्ध कवि मुल्लादाऊद, कुतुबन, जायसी, तुलसीदास, उसमान, सबलसिंह आदि हैं।
बघेली - बघेली राजपूतों के आधार पर रीवां तथा आसपास का इलाका बघेलखण्ड कहलाता है और वहाँ की बोली को बघेलखण्डी या बघेली कहते हैं। बघेली का उदभव अर्धमागधी अपभ्रंश के ही क्षेत्रीय रूप से हुआ है। इसका क्षेत्र रीवां, नागौद, शहडोल, सतना, मैहर तथा आसपास का क्षेत्र है।
छत्तीसगढ़ी - मुख्य क्षेत्र छत्तीसगढ़ होने के कारण इसका नाम छत्तीसगढ़ी पड़ा है। अर्धमागधी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से इसका विकास हुआ है। इसका क्षेत्र सरगुजा, कौरिया, बिलासपुर, रायगढ़, खैरागढ़, रायपुर, दुर्ग, नन्दगाँव, काकेर आदि है।
पश्चिमी राजस्थानी - राजस्थानी का यह रूप पश्चिमी राजस्थानी अर्थात्, जोधपुर, अजमेर, किशनगढ़, मेवाड़, सिरोही, जैसलमेर, बीकानेर आदि में बोला जाता है। इसे मारवाड़ी भी कहते हैं। शौरसेनी अपभ्रंश से इसका विकास हुआ है।
उत्तरी राजस्थानी - उत्तरी राजस्थान में इसका क्षेत्र अलवर, गुडगाँव, भरतपुर तथा आस- पास है। मेओ जाति के इलाके मेवात के नाम पर इसे 'मेवाती' भी कहते हैं। इसकी एक मिश्रित बोली अहीरवाटी है जो गुड़गाँव, दिल्ली तथा करनाल के पश्चिमी क्षेत्रों में बोली जाती है। उत्तरी राजस्थानी का उद्भव शौरसेनी अपभ्रंश से हुआ है।
पूर्वी राजस्थानी - राजस्थान के पूर्वी भाग में जयपुर, अजमेर, किशनगढ़ आदि में यह बोली' जाती है। इसकी प्रतिनिधि बोली जयपुरी है, जिसका केन्द्र जयपुर है। जयपुरी को ढूंढाणी भी कहते हैं, क्योंकि इस क्षेत्र का नाम ढूढाण है।
दक्षिणी राजस्थानी - इन्दौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, भोपाल, होशंगाबाद तथा इनके आस- पास इसका क्षेत्र है। इसकी प्रतिनिधि बोली मालवी है, जिसका मुख्य क्षेत्र मालवा है। शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली में केवल लोक साहित्य है।
पश्चिमी पहाडी - जौनसार, सिरमौर, शिमला, मण्डी, चम्बा तथा आसपास इसका क्षेत्र है। शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली में केवल लोक साहित्य है।
मध्यवर्ती पहाड़ी - शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित इस बोली का क्षेत्र गढ़वाल, कुमाऊँ, तथा आसपास का कुछ क्षेत्र है। वस्तुतः यह गढ़वाली और कुमाउंनी इन दो बोलियों का ही सामूहिक नाम है। इन बोलियों में लोक साहित्य तो पर्याप्त है साथ ही कुछ साहित्य भी है।
भोजपुरी - बिहार के शाहाबाद जिले के भोजपुर गाँव के नाम के आधार पर इस बोली का नाम 'भोजपुरी' पड़ा है। मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से विकसित इस बोली का क्षेत्र बनारस, जौनपुर, चम्पारन, मिर्जापुर, गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, बस्ती, शाहबाद, सारन तथा आसपास का कुछ क्षेत्र है। हिन्दी प्रदेश की बोलियों में भोजपुरी बोलने वाले सबसे अधिक हैं।-
मगही - संस्कृत 'मगध' से विकसित शब्द 'मगह' पर इसका नाम आधारित है। मागधी अपभ्रंश से विकसित यह बोली पटना, गया, पलामू, हजारीबाग, मुंगेर, भागलपुर तथा इसके आस पास बोली जाती है।
मैथिली - मागधी अपभ्रंश के मध्यवर्ती रूप से विकसित यह बोली हिन्दी और बांग्ला क्षेत्र की सन्धि पर मिथिला में बोली जाती है। दरभंगा, मुजफ्फरपुर, पूर्णिया तथा मुंगेर आदि में इसका क्षेत्र है। हिन्दी साहित्य को विद्यापति जैसे रससिद्ध कवि देने का श्रेय मैथिली को ही है।
हिन्दी का प्रारम्भिक स्वरूप
अवहट्ट और पुरानी हिन्दी - साहित्य राष्ट्र की सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं वैचारिक ऊर्जा का स्रोत होता है। लोक-चेतना की अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों की अपेक्षा लोक के अधिक निकट रहने के कारण साहित्य युगीन चेतना को प्रतिबिम्बित करते हुये भावी चिन्तन का प्रेरक तत्व भी बन जाता है। राष्ट्रवाणी में जन-जन की अनुभूतियाँ समाविष्ट रहती हैं। भाषा ही समाज की ऐसी पूँजी है, जिसका उपयोग हर नागरिक समान रूप से करता है और इसके संशोधन एवं परिवर्धन में प्रत्यक्ष और परोक्षतः अपना योगदान देता है। वस्तुतः भाषा ऐसा प्रवाह है जिसे जन-जन भगीरथ की भाँति प्रवाहित करते हैं। वैयाकरण उस प्रवाह को केवल परिष्कृत एवं प्राञ्जल बनाने का प्रयास करते हैं। यह प्राञ्जलता भाषा प्रवाह को रोक नहीं पाती। केवल ऐसी झीनी विभाजक रेखा बना देती है जिससे पूर्वा पर सम्बन्ध बना रहने पर भी एक अलगाव की प्रतीति होने लगती है। वस्तुतः वैयाकरण भाषा-संस्कार के सम्बन्ध पुष्ट प्रमाणों को ग्रहण करता है। लोक प्रवाह इतना प्रखर होता है कि उस पर पैर टिकाना वैयाकरण के वश में नहीं होता अतः वह मंथर गति वाली साहित्य चेतना को व्याकरण का आधार बनाता है और लोक चेतना को उसी क्रम में संकेतित करता है। वैदिक साहित्य के प्रणयन के पश्चात् संस्कारिक होकर जनभाषा संस्कृत बनी थी। पाणिनी द्वारा 'संस्कृत' भाषा के विकास के पूर्व वैदिक युग से आगे निकल गयी थी। यही नियम भाषा-विकास की दृष्टि से हर युग पर लागू होता है।
भाषा विकास के इस क्रम के अन्तर्गत भाषा की तीन कोटियाँ एक ही युग में विद्यमान रहती है- साहित्यिक भाषा, बोलचाल की भाषा एवं ग्रामीण भाषा अथवा अशिक्षित समूहों की भाषा। प्राचीनकाल में संस्कृत मानक भाषा थी, प्राकृत आम बोलचाल या जनसाधारण की भाषा थी और अपभ्रंश ग्राम्य समूहों की भाषा। ये तीनों भाषा के रूप में थे। अतः संस्कृत वैयाकरणों के तीनों रूपों का संकेत किया है। समय पाकर भाषाओं का यह स्वरूप बदलता रहा। संस्कृत परम्परागत भाषा बन गयी, जबकि प्राकृत साहित्य की ओर अपभ्रंश बोलचाल की। निश्चित रूप से उस समय अपभ्रंश का भी एक रूप ग्राम्य समूह में बनने लगा होगा। पंतजलि ने अपभ्रंश का उल्लेख किया है। पंतजलि का समय वि. 1200 वर्ष पूर्व माना जाता है। पंतजलि ने निश्चित रूप से इसे ग्राम्यभाषा के रूप में व्यह्नत किया है। कालान्तर में दण्डी और भानह के युग तक अपभ्रंश की स्वतन्त्र सत्ता विकसित होने लगी। रुद्रट के समय प्राकृत मानक भाषा बन चुकी थी और अपभ्रंश उसका स्थान ले चुकी थी। अपभ्रंश के लोक भाषा बनने तक ग्राम्य-भाषा के रूप में अपभ्रंश के देशी रूप व्यहत होने लगे थे। अपभ्रंश भाषा के शिष्ट भाषा की कुछ स्थितियाँ विचारणीय हैं-
1. संवत् 1145 में हेमचन्द्र का जन्म हुआ। उन्होंने 'सिद्ध हेम शब्दानुशासन' नामक व्याकरण ग्रन्थ लिखा, जिसमें अपभ्रंश का व्याकरण भी विवेचित हुआ है। इस प्रकार 1150 ई. तक अपभ्रंश शिष्ट भाषा ही नहीं साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो गयी थी।
2. अपभ्रंश के साहित्यिक स्वरूप के निर्धारण का काल यदि हेमचन्द्र से दो सौ वर्ष पूर्व भी माना जाय तो उस युग में अपभ्रंश का बोलचाल और ग्राम्य-समूह भी रहा होगा, जिसका पता नहीं चल सका।
3. आचार्य हेमचन्द्र के समय तक अपभ्रंश चरम उत्कर्ष पर पहुँच चुकी थी। अतः साहित्यिक भाषा के रूप में दूसरी भाषा का विकास अवश्य होने लगा होगा।
भाषा वैज्ञानिकों ने ही नहीं हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने इन मान्यताओं के आधार पर अनुसंधान कार्य प्रारम्भ रखा और उस युग में उन ग्रन्थों का अनुशीलन किया जो मूलतः संग्रह निबन्ध थे। ऐसे ग्रन्थों में 'प्राकृत पैगलम्' और पुरातन प्रबन्ध संग्रह प्रमुख हैं। प्राकृत पैंगलम् का संग्रह 14वीं शताब्दी तक हो चुका था। ऐसा प्रतीत होता है कि 14वीं शती में जब हिन्दी साहित्य की विकसित परम्परा विद्यमान थी, हिन्दी साहित्य के संकलन का प्रयास किया गया। इस क्रम में प्राकृत और अपभ्रंश से जुड़ा होने पर भी जो साहित्य मिला वह पुरानी हिन्दी का था क्योंकि ये छंद मौखिक परम्परा से चले आते रहे होंगे। चूँकि अपभ्रंश जब साहित्यिक भाषा के रूप में उत्कर्ष पर थी तभी द्वितीय स्तर की भाषा के रूप में देशी भाषा का साहित्य भी लिखा जाने लगा होगा और उसका प्रचार लोक-परम्परा में ही रहा होगा, जिसका संकलन सर्वप्रथम प्राकृत-पैंगलम् के संग्रहकर्ता ने किया होगा। साहित्यिक भाषा के रूप में द्वितीय स्तर की भाषा में 'अपभ्रंश' ही अपने विकृत रूप में अवहट्ठ नाम से व्यवहृत होती थी क्योंकि द्वितीय स्तर की भाषा प्रथम स्तर की भाषा का जन प्रचलित रूप होती है। इस द्वितीय स्तर की भाषा के नीचे तृतीय स्तर की ग्राम्य भाषा भी देशी नाम से विकसित हो रही थी।
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